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आत्‍म-साक्षात्‍कार

श्रावण की पूर्णिमा बीते अभी कुछ दिन ही हुए। कल दोपहर से जो पवन सरसरा रही थी, चटक धूप में घुल-मिल जाने के बाद भी उसका एहसास शीतल था। शाम और रात को हवा का स्‍पंदन अत्‍यधिक शीतल हो चुका था। पूर्वी और पश्चिमी नभ के बीच दमकता चंद्रमा रात को ठंडी हवा सेे आच्‍छादित पृथ्‍वी से कितना सुंदर दिख रहा था। आकाश का रंग गाढ़ा नीला था। उस पर चांदी के रंग का चांद कितना मधुर लग रहा था। बादलों के बहुत छोटे-छोटे अंश गाढ़े नीले नभ और चांदी के रंग के चांद के साथ‍ कितने कीमती लग रहे थे। अाधी रात बीतने को थी। निवास स्‍थान का परिवेश घर की छत से सुनसान प्रतीत हो रहा था। लोग घरों में कैद हो चुके थे। कुछ लोगों काेे इस रात्रि सुंदरता में परस्‍पर बातें करते हुए, उन्‍हें सड़क पर चलते-फि‍रते हुए देखना अच्‍छा लगा। कई आकांक्षाओं और लिप्‍साओं मेंं डूबा मेरा तुच्‍छ मन न जाने कितनी जल्‍दी अपनेे खयाल बदलता रहा। कभी प्राकृतिक सुंदरता पर मन तरह-तरह के विचार करता तो कभी प्राकृतिक सुंदरता के जनक के बारे में सोचने लग जाता। कभी अपनी गरीबी पर स्थिर होकर अपनी रोजी-रोटी की चिंता से ग्रस्‍त मेरा हृदय मेरे शरीर के साथ निरंतर छत पर इधर-उ…
हाल की पोस्ट

खेल में चमकने न चमकने की जिम्‍मेदारी शासकों की होती है

स्‍वामी विवेकानंद ने कभी कहीं किसी संदर्भ में कहा था कि खेल में बहाया गया पसीना,दिखाई गई एकाग्रता और क्रियान्वित किए गए संकल्‍प ही मनुष्‍य को सोच-विचार के सर्वोच्‍च शिखर पर विराजमान करते हैं।शायद प्रसंग आध्‍यात्मिक चर्चा का था। विचार-विमर्श के दौरान किसी विद्वान ने उनसे ऐसा प्रश्‍न किया था,तब उन्‍होंने ऐसा उत्‍तर दिया।अब मुझे भी महसूस हो रहा है कि ऐसी कौन सी वैचारिक शक्ति है,जो विचारशक्ति के साथ शारीरिक शक्ति बढ़ाए। मेरे विचार से किसी भी तरह की क्रीड़ा में किया गया परिश्रम मनुष्‍य को आध्‍यात्मिक दृष्टि के सर्वोच्‍च शिखर पर भी पहुंचा सकता है। विचारक,विद्वान,धर्मगुरु,आध्‍यात्मिक पथ-प्रदर्शक होना इतना महत्‍त्‍वपूर्ण नहीं,जीवन में जितना महत्‍त्‍वपूर्ण खेलों में परिश्रम से खेल को उसके मौलिक और श्रेष्‍ठ परिणाम तक पहुंचाना होता है। और जो व्‍यक्ति ऐसा करता है निश्चित रूप से उसे परिभाषित तो खिलाड़ी के रूप में किया जाता है,लेकिन वह सभी महापुरुषों से श्रेष्‍ठ ही होता है।आजकल पीवी सिंधू और साक्षी मलिक चर्चा मेंहैं। ओलंपिक की कुश्‍ती और बैडमिंटन प्रतियोगिताओं में इन दोनों ने भारत के लिए क्रमश: द्विती…

त्‍यौहार और उपलब्धियों से भरा दिवस

वैसे तो लोग एक दिन की बातों और उपलब्धियों को अगले दिन से भूलने लगते हैं। लेकिन एक दिन की इन उपलब्धियों पर अगर सिर्फ एक दिन जीवन जीने वालों के हिसाब से सोचा जाए तो यह एक दिन बहुत बड़ा जाता है। यह दिन जीवन से भी विशाल हो जाता है। अचानक इसका आकार इतना बढ़ जाता है कि इस एक दिन की बातें, घटनाएं और उपलब्धियां इतिहास बन जाया करती हैं।आज का दिन ऐसा ही था। विशेषकर भारतीय लोगों के लिए यह दिन खेलों की सबसे बड़ी वैश्विक प्रतियोगिता ओलम्पिक खेल में अत्‍यंत महत्‍त्‍वपूर्ण रहा। आज भारतीय कुश्‍ती की महिला पहलवान साक्षी मलिक ने ओलंपिक प्रतियोगिता में तीसरा स्‍थान प्राप्‍त कर तांबे का पदक जीता। इसके बाद बैड‍मिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधू ने ब्राजील के रिया डी जेनेरियो में चल रहे ओलंपिक खेलों की बैडमिंटन प्रतिस्‍पर्द्धा के सेमि फाइनल में जापान की खिलाड़ी नोजोमी ओकूहारा कोसीधे सेटों में 21-19 और 21-10 से हराकर इस प्रतिस्‍पर्द्धा के फाइलन में स्‍थान पक्‍का कर लिया। इस विजय के साथ सिंधू ने भारत के लिए महिला बैडमिंटन में रजत पदक सुनिश्चित कर लिया। यदि पीवी सिंधू फाइनल में भी विजय प्राप्‍त करती हैं तो वे ओलंपिक में बैड…

सामाजिक सरोकार से जुड़ें युवा

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अन्‍धविश्‍वास छोड़ आत्‍मविश्‍वास अपनाएं

अन्‍धश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्‍यक्ष मराठी समाजसेवी नरेन्‍द्र दाभोलकर की हत्‍या। उन्‍हें निकट से गोली मारी गई। वे धर्माडम्‍बरी, अन्‍धविश्‍वासी लोगों को जीवन को वास्‍तविकता के धरातल पर देखने के लिए प्रेरित करते थे। आज के आम आदमी को किस दिशा में सोचनेवाला कहें। वह अपनी सुरक्षा के लिए धार्मिक कुरीतियों के हवाले है या वो अपनी नजर में मौजूद अपनी उन गलतियों से आत्‍मविनाशी हो-हो कर धर्मतन्‍त्र के तकाजे में अपने व्‍यक्तित्‍व को बदलने की सोचता है, जो वह बचपन से लेकर अब तक करता आ रहा है। ऐसे व्‍यक्तियों को यदि यथार्थपरक दृष्टि से सम्‍पूर्ण नरेन्‍द्र दाभोलकर जैसा व्‍यक्ति जीवन को उस रुप में जीने को प्रेरित करे, जिस रुप में वह है या हो सकता है तो निसन्‍देह धर्म के ठेकेदारों को इससे अपनी दूकानों के बन्‍द होने का डर सताने लगता है। परिणामस्‍वरुप वे दाभोलकर जैसे जमीनी और यथार्थवादियों को या तो मृत्‍यु दे देते हैं या उन्‍हें इस प्रकार प्रताड़ित करते हैं कि वे जीते जी मौत के कब्‍जे में पहुंच जाते हैं।बात केवल समाजसेवी की मौत पर दुख मनाने या अन्‍धविश्‍वास की दूकानें चलानेवालों के दुस्‍साहस के जीत की न…

भड़काऊ फिल्‍म-सामग्री पर प्रतिबन्‍ध हो

दिल्‍ली बस बलात्‍कार मामले में प्रधानमंत्री ने अपने ताजा सम्‍बोधन में कहा कि पुलिस की सेवाओं में महिला सुरक्षा शीर्ष पर होनी चाहिए। अपने आवास पर आईपीएस प्रोबेश्‍नर्स के समूह से मुखातिब होते हुए मनमोहन सिंह ने सामूहिक बलात्‍कार जैसे जघन्‍य अपराधों में लोग शामिल क्‍यों होते हैं, यह पता लगाने के लिए व्‍यवहारगत और मनोचिकित्‍सकीय अध्‍ययनों पर जोर देने की बात कही। उन्‍होंने स्‍वीकार किया कि हम ऐसे समय में हैं, जहां चहुं ओर तनाव बढ़ रहा है। यदि प्रधानमंत्री को यह अहसास है कि हम भारतीय तनावों से घिरे हुए हैं तो स्‍वाभाविक रुप से उन्‍हें इसका ज्ञान भी होना चाहिए कि बलात्‍कार या सामूहिक बलात्‍कार के जघन्‍य अपराधों से लेकर हिंसा, मारकाट, लूट-खसोट, गुंडागर्दी, बदमाशी समाज में क्‍यों व्‍याप्‍त है। देश के प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित व्‍यक्ति यदि बलात्‍कार जैसी घटनाओं के कारणों से अनभिज्ञ है तो यह बड़ी ही हास्‍यास्‍पद स्थिति है।घटनाओं और दुर्घटनाओं के बाद उन पर रोना, दुख प्रकट करना भारतीय सत्‍ता के शीर्षस्‍थ नेताओं की स्‍वाभाविक प्रवृत्ति रही है लेकिन हर सामाजिक गतिविधि को पेशेवर बनाने और हर भारतीय…