सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

November, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हर जिले में अस्पताल, अच्छी पहल

हर जिले में अस्पताल, अच्छी पहल अभी कुछ दिन पहले समाचार पढ़ा कि सरकार अब देश के हर जिले में एक बड़ा और सुविधाजनक चिकित्सालय खोलने पर विचार कर रही है। यह खुशखबरी इसलिए है कि मनुष्य के लिए दाना-पानी के बाद सबसे ज्यादा जरूरत स्वास्थ्य सेवाओं की सुविधाजनक उपलब्धता ही है। अपने मूल निवास में ही यह सुविधा प्राप्‍त करने पर आम आदमी विश्वसनीय तरीके से सच्चा लोकतंत्र महसूस करेगा। उसे लगेगा कि उसके आधार पर खड़ा तंत्र अब वह सब उपलब्ध कराने लगा है, जिसकी जरूरत दशकों से थी। लेकिन दूसरी ओर दुख भी है कि मनुष्य की ऐसी आधारभूत आवश्यकता पर स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद अब विचार किया जा रहा है। केन्द्र सरकार से यही अपेक्षा है कि वह अपने इस महत्वपूर्ण विचार का अतिशीघ्र क्रियान्वयन करे। इस सार्वजनिक चिकित्सा सेवा की सरकारी कार्यप्रणालियों पर गहन अध्ययन होना चाहिए ताकि यह लंबे समय तक सुविधाजनक तरीके से आम भारतीयों को लाभ पहुंचाती रहे। भारत के प्रत्येक जिले में एक चिकित्सालय बनता है तो यह अच्छी उपलब्धि होगी। लेकिन इन चिकित्सालयों में प्रदान की जानेवाली स्वास्थ्य सेवाओं का निष्पादन समुचित तरीके से होना चाहिए। चि…

आप भला तो जग भला

अकसर हम समाज और इसके भौतिक-अभौतिक व्‍यवहारों से स्‍वयं को दुखी करते हैं।हम सोचते हैं कि स्थितियां,घटनाएं और आयोजन हमारे अनुकूल हों। ये हमारेअनुसार उपस्थित हों। कोई भी मनुष्‍य सकारात्‍मक अपेक्षा के साथ ऐसा होने कीकल्‍पना करता है। और ऐसी कल्‍पना के मूल में हर वस्‍तु व प्रत्‍येकसामाजिक व्‍यवहार सदभावना के साथ मौजूद रहता है। लेकिन क्‍या हमारेमनोत्‍कर्ष के लिए चीजें,घटनाएं बदल जाएंगी?निसन्‍देह ऐसा नहीं होगा। अपनी अपेक्षा के अनुरूप चीजोंके न होने,घटनाओं के न घटनेका दुखभाव भूलने के लिए कुछ दिनों तक आप अपने परिवेश से दूर चले जाएं। आपका अपने शहर,घर और पास-पड़ोस से एक माह तक कोई सम्‍पर्क न हो। महीनेभर बाद वापस आने पर आप क्‍या पाते हैं, यही कि कुछ नहीं हुआ। आपके मन मुताबिक कुछ नहीं बदला। सब कुछ पहले जैसा ही है। शहर, घर और पास-पड़ोस आपकी अनुपस्थिति में भी अपनी अच्‍छाईयों-बुराईयों के साथ पूर्ववत हैं। जब आपकी अस्‍थायी अनुपस्थिति से अपके परिवेश में बदलाव नहीं आया और वापस ऐसे परिवेश में आकर आपको इसका भान भी हो गया, तोफिरअपनी इच्‍छापूर्ति न होने का दुख हमेंक्‍यों हो? क्‍यों हमको यह महसूस हो कि अमुक ची…

कर्मचारियों के प्रति प्रबंधन-वर्ग का दायित्व

कर्मचारियों के प्रतिप्रबंधन-वर्ग का दायित्व आज दुनियाभर में फैले 80 प्रतिशत व्यापार का संचालन निजी कम्पनियों द्वारा किया जा रहा है। इसके लिए कम्पनियां अपने यहां एक मजबूत प्रबंधन-तंत्र बनाती हैं। इसका मुख्य कार्य कम्पनी की आर्थिक,व्यावसायिक,व्यापारिक,कानूनी कार्यप्रणालियों और गतिविधियों पर बराबर नजर रखना होता है। आए दिन कम्पनियों को अपने और दुनिया के अन्य देशों की सरकारी नीतियों की अहम जानकारियां एकत्र करनी पड़ती हैं। इनमें भी अपने और संबंधित देश के कम्पनी मामलों के मंत्रालय द्वारा समय-समय पर जारी की गई रिपोर्टों से अवगत होना बहुत जरुरी होता है,ताकि कम्पनी और कर्मचारियों के उज्ज्वल भविष्य के महत्वपूर्ण निर्णय समय पर लिए जा सकें। बकायदा इसके लिए कम्पनी अधिनियम,1956 के अधीन कम्पनियों को सरकारी नीतियों पर चलने के लिए भी निर्देश दिए जाते हैं।
      किसी देश में सरकारी प्रतिष्ठानों,निजी और अर्द्ध-सरकारी कम्पनियों का संचालन इतना कुशल तो होना ही चाहिए कि अपना फायदा देखने से पहले वे आम आदमी की सामाजिक जरुरत का भी ध्यान रखें। इसी उद्देश्‍य के मद्देनजर उन्हें सरकारी नियमों के अधीन रहकर अपना व्याप…

समाज से जुड़ें नौजवान

समाज से जुड़ें नौजवान समाज की सही दशा-दिशा बच्चों के उचित पालन-पोषण पर निर्भर हैA यह बात सब जानते हैं और सबसे जरूरी है। शासन-प्रशासन को भी इसकी जानकारी है। लेकिन क्या जानकारी भर होने से उद्देशय प्राप्त किया जा सकता है\ प्रश्न ये है कि आज की किशोरवय और नौजवान पीढ़ी इतनी आधुनिक क्यों हो गई कि उसे अपना विवेक इस्तेमाल करने की जरूरत ही महसूस नहीं होती। यहां-वहां हर कहीं चाहे घर हो या विद्यालय,गली या सार्वजनिक स्थल सब जगह बच्चों का अमर्यादित व्यवहार पुरातन सभ्यता को चुनौती दे रहा है। स्थिति इतनी दुरूह हो गई है कि वे सार्वजनिक स्थानों पर प्रौढ़ व्यक्तियों की उपस्थिति में ही असभ्य व असामाजिक हरकतें कर रहे हैं। उन्हें संकोच,शील,डर,बदनामी के शब्द और इनका मतलब जैसे सिखाया ही नहीं गया है। हैरानी तब ज्यादा बढ़ जाती है,जब उनके पास अपनी ऐसी हरकतों को सही बताने के कुतर्कों की भरमार होती है ओर वे इनका भरपूर इस्तेमाल भी करते हैं। आखिर यह नौबत कैसे आ गई, क्या तरक्की का तात्पर्य अलग-अलग उम्र के लिए निर्धारित पुरातन व्यवहार,संस्कृति, मर्यादा को पाटकर समाज को बदतमीजी की घिनौनी दिशा देने से है\ क्या पुरातन …