सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्रेरणादायी पहल: हिन्दुस्तान में 'विचार बिन्दु'

प्रेरणादायी पहल: हिन्दुस्तान में 'विचार बिन्दु'

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आप भला तो जग भला

अकसर हम समाज और इसके भौतिक-अभौतिक व्‍यवहारों से स्‍वयं को दुखी करते हैं।हम सोचते हैं कि स्थितियां,घटनाएं और आयोजन हमारे अनुकूल हों। ये हमारेअनुसार उपस्थित हों। कोई भी मनुष्‍य सकारात्‍मक अपेक्षा के साथ ऐसा होने कीकल्‍पना करता है। और ऐसी कल्‍पना के मूल में हर वस्‍तु व प्रत्‍येकसामाजिक व्‍यवहार सदभावना के साथ मौजूद रहता है। लेकिन क्‍या हमारेमनोत्‍कर्ष के लिए चीजें,घटनाएं बदल जाएंगी?निसन्‍देह ऐसा नहीं होगा। अपनी अपेक्षा के अनुरूप चीजोंके न होने,घटनाओं के न घटनेका दुखभाव भूलने के लिए कुछ दिनों तक आप अपने परिवेश से दूर चले जाएं। आपका अपने शहर,घर और पास-पड़ोस से एक माह तक कोई सम्‍पर्क न हो। महीनेभर बाद वापस आने पर आप क्‍या पाते हैं, यही कि कुछ नहीं हुआ। आपके मन मुताबिक कुछ नहीं बदला। सब कुछ पहले जैसा ही है। शहर, घर और पास-पड़ोस आपकी अनुपस्थिति में भी अपनी अच्‍छाईयों-बुराईयों के साथ पूर्ववत हैं। जब आपकी अस्‍थायी अनुपस्थिति से अपके परिवेश में बदलाव नहीं आया और वापस ऐसे परिवेश में आकर आपको इसका भान भी हो गया, तोफिरअपनी इच्‍छापूर्ति न होने का दुख हमेंक्‍यों हो? क्‍यों हमको यह महसूस हो कि अमुक ची…

कर्मचारियों के प्रति प्रबंधन-वर्ग का दायित्व

कर्मचारियों के प्रतिप्रबंधन-वर्ग का दायित्व आज दुनियाभर में फैले 80 प्रतिशत व्यापार का संचालन निजी कम्पनियों द्वारा किया जा रहा है। इसके लिए कम्पनियां अपने यहां एक मजबूत प्रबंधन-तंत्र बनाती हैं। इसका मुख्य कार्य कम्पनी की आर्थिक,व्यावसायिक,व्यापारिक,कानूनी कार्यप्रणालियों और गतिविधियों पर बराबर नजर रखना होता है। आए दिन कम्पनियों को अपने और दुनिया के अन्य देशों की सरकारी नीतियों की अहम जानकारियां एकत्र करनी पड़ती हैं। इनमें भी अपने और संबंधित देश के कम्पनी मामलों के मंत्रालय द्वारा समय-समय पर जारी की गई रिपोर्टों से अवगत होना बहुत जरुरी होता है,ताकि कम्पनी और कर्मचारियों के उज्ज्वल भविष्य के महत्वपूर्ण निर्णय समय पर लिए जा सकें। बकायदा इसके लिए कम्पनी अधिनियम,1956 के अधीन कम्पनियों को सरकारी नीतियों पर चलने के लिए भी निर्देश दिए जाते हैं।
      किसी देश में सरकारी प्रतिष्ठानों,निजी और अर्द्ध-सरकारी कम्पनियों का संचालन इतना कुशल तो होना ही चाहिए कि अपना फायदा देखने से पहले वे आम आदमी की सामाजिक जरुरत का भी ध्यान रखें। इसी उद्देश्‍य के मद्देनजर उन्हें सरकारी नियमों के अधीन रहकर अपना व्याप…

अन्‍धविश्‍वास छोड़ आत्‍मविश्‍वास अपनाएं

अन्‍धश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्‍यक्ष मराठी समाजसेवी नरेन्‍द्र दाभोलकर की हत्‍या। उन्‍हें निकट से गोली मारी गई। वे धर्माडम्‍बरी, अन्‍धविश्‍वासी लोगों को जीवन को वास्‍तविकता के धरातल पर देखने के लिए प्रेरित करते थे। आज के आम आदमी को किस दिशा में सोचनेवाला कहें। वह अपनी सुरक्षा के लिए धार्मिक कुरीतियों के हवाले है या वो अपनी नजर में मौजूद अपनी उन गलतियों से आत्‍मविनाशी हो-हो कर धर्मतन्‍त्र के तकाजे में अपने व्‍यक्तित्‍व को बदलने की सोचता है, जो वह बचपन से लेकर अब तक करता आ रहा है। ऐसे व्‍यक्तियों को यदि यथार्थपरक दृष्टि से सम्‍पूर्ण नरेन्‍द्र दाभोलकर जैसा व्‍यक्ति जीवन को उस रुप में जीने को प्रेरित करे, जिस रुप में वह है या हो सकता है तो निसन्‍देह धर्म के ठेकेदारों को इससे अपनी दूकानों के बन्‍द होने का डर सताने लगता है। परिणामस्‍वरुप वे दाभोलकर जैसे जमीनी और यथार्थवादियों को या तो मृत्‍यु दे देते हैं या उन्‍हें इस प्रकार प्रताड़ित करते हैं कि वे जीते जी मौत के कब्‍जे में पहुंच जाते हैं। बात केवल समाजसेवी की मौत पर दुख मनाने या अन्‍धविश्‍वास की दूकानें चलानेवालों के दुस्‍साहस के जीत की न…