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अकसर हम समाज और इसके भौतिक-अभौतिक व्‍यवहारों से स्‍वयं को दुखी करते हैं।हम सोचते हैं कि स्थितियां,घटनाएं और आयोजन हमारे अनुकूल हों। ये हमारेअनुसार उपस्थित हों। कोई भी मनुष्‍य सकारात्‍मक अपेक्षा के साथ ऐसा होने कीकल्‍पना करता है। और ऐसी कल्‍पना के मूल में हर वस्‍तु व प्रत्‍येकसामाजिक व्‍यवहार सदभावना के साथ मौजूद रहता है। लेकिन क्‍या हमारेमनोत्‍कर्ष के लिए चीजें,घटनाएं बदल जाएंगी?निसन्‍देह ऐसा नहीं होगा। अपनी अपेक्षा के अनुरूप चीजोंके न होने,घटनाओं के न घटनेका दुखभाव भूलने के लिए कुछ दिनों तक आप अपने परिवेश से दूर चले जाएं। आपका अपने शहर,घर और पास-पड़ोस से एक माह तक कोई सम्‍पर्क न हो। महीनेभर बाद वापस आने पर आप क्‍या पाते हैं, यही कि कुछ नहीं हुआ। आपके मन मुताबिक कुछ नहीं बदला। सब कुछ पहले जैसा ही है। शहर, घर और पास-पड़ोस आपकी अनुपस्थिति में भी अपनी अच्‍छाईयों-बुराईयों के साथ पूर्ववत हैं। जब आपकी अस्‍थायी अनुपस्थिति से अपके परिवेश में बदलाव नहीं आया और वापस ऐसे परिवेश में आकर आपको इसका भान भी हो गया, तोफिरअपनी इच्‍छापूर्ति न होने का दुख हमेंक्‍यों हो? क्‍यों हमको यह महसूस हो कि अमुक ची…

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